श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज के शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...

श्रद्धेय योगऋषि परम पूज्य स्वामीजी महाराज के  शाश्वत प्रज्ञा से नि:सृत शाश्वत सत्य...

ध्यान

      पतंजलि के अष्टाङ्ग योग के अनुसार 'ध्यानयोगाङ्गों में सातवां अंग है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार ये पाँच योग के बाह्य अंग माने जाते हैं तथा धारणा, ध्यान समाधि ये तीन अन्तरङ्ग माने जाते हैं। अन्दर के विराट् साम्राज्य में प्रवेश करने हेतु 'धारणा’, अन्तर और बाह्य जगत् के बीच सेतु का काम करता है तो ध्यान उस अन्तर्जगत् में प्रथम प्रवेश द्वार के समान या प्रथम पदार्पण के समान है। संसार के भिन्न-भिन्न मत-सम्प्रदायों में साधना की विधियों में भेद हो सकता है, लेकिन ध्यान के विषय में मतभेद नहीं हो सकता, क्योंकि ध्यान रूपी प्रवेश द्वार के बिना अन्तर्जगत् में प्रवेश हो ही नहीं सकता। अत: साधना की सभी विधियों में ध्यान अत्यावश्यक है। पतंजलि योगानुसार यम-नियम रूपी महाव्रतों का पालन करने के पश्चात् आसनसिद्ध हो जाने पर, 'प्राणायाम के माध्यम से मन व प्राण के सभी मलों का नाश करके, इन्द्रियों को अपने-अपने विषयों से समेट कर, मन को शरीर के किसी स्थान विशेष में समाहित करके, उस देश विशेष में ध्यायमान विषय को आलम्बन बनाकर ज्ञान की जो एकतानता है उसे 'ध्यानकहते हैं- देश बन्धाश्चित्तस्य धारणा।
तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्’’ (योग दर्शन 3/1., .2) अर्थात् तेल की अजस्र गिरती हुई धारा के समान ध्यायमान विषय के ज्ञान का अखण्ड प्रवाह ही ध्यान है। यह ज्ञान किसी दूसरे विषय के ज्ञान से उस समय अर्थात् ध्यानकाल में सर्वथा अमिश्रित रहता है। सांख्यदर्शन में मन के निर्विषय होने को ही ध्यान कहा है ''ध्यानं निर्विषयं मन:’’-(सांख्यसूत्र 6.25) यहाँ निर्विषय का अर्थ है कि उस समय कोई सांसारिक विषय या इन्द्रियों का विषय चित्त में नहीं रहता, अपितु वह बह्म ही इस समय चित्त के आलम्बन का विषय बना हुआ रहता है। साधना की दृष्टि से यह चित्त की सर्वोत्कृष्ट अवस्था है, क्योंकि चित्त का कार्य है किसी विषय का आलम्बन लेकर उस पर चिन्तन करना। कठोपनिषद् में कहा है-
एतदालम्बनं श्रेष्मेतदालम्बनं परम्।
एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते।।    -(कठोपनिषद्)
अर्थात् समस्त आलम्बनों में ब्रह्म का आलम्बन ही सर्वश्रेष्ठ व बड़ा आलम्बन है। इस आलम्बन को पा लेने वाला व्यक्ति ब्रह्मलोक में महिमा को प्राप्त हो जाता है- अर्थात् ज्ञानी लोगों में, विद्वानों व योगियों के बीच में वह व्यक्ति विशेष प्रतिष्ठा को प्राप्त होकर ईश्वर की कृपा का पात्र बन जाता है। ध्यान की उत्कृष्ट अवस्था ही योगङ्गों में अन्तिम अङ्ग समाधि में परिवर्तित हो जाती है- चित्त के आलम्बन का विषय जब केवल ज्ञानरूप न रहकर अर्थमात्र के रूप में निर्भासित होने लगता है, ज्ञान का अपना स्वरूप शून्य जैसे हो जाता है अर्थात् 'जानामिइस प्रकार की भी अनुभूति जब नहीं होती है अर्थात् ध्येयभूत अर्थ पर आत्यन्तिक एकाग्रता होने के कारण केवल उसी अर्थ के रूप में निर्भासित होने लगता है, ध्यान की इस अवस्था को ही 'समाधिकहते हैं। वे ये धारणा, ध्यान और समाधि तीनों एकत्र अर्थात् एक ही आलम्बनगत हो जाते हैं तब इसे 'संयमकहते हैं ''त्रयमेकत्र संयम:’’ यह संयम शब्द योगदर्शन की अपनी तान्त्रिकी परिभाषा है और उस संयम पर विजय प्राप्त करने से प्रज्ञा का प्रकाश होता है- ''तज्जयात्  प्रज्ञालोक:’’। जैसे-जैसे संयम स्थिर होता जाता है, उसी क्रम में समाधिजन्य प्रज्ञा विशारद अर्थात् निर्मलतर और निर्मलतम होती चली जाती है और उस ध्येयपदार्थ का स्वरूप इस योगी के समक्ष सर्वथा, सर्वभावेन प्रकट हो जाता है। चेतना की इस अवस्था में ही योगी कह उठता है-
ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद्, ब्रह्मपश्चाद् दक्षिणतश्चोत्तरेण।
अधश्चोर्ध्वं च पस्रतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम्।।  (मुण्डकोपनिषद् 2.2.12)
यह अमृत रूपी ब्रह्म ही मेरे सामने पीछे, दाँयें, बायें, उत्तर, दक्षिण, ऊपर, नीचे सर्वत्र प्रस्रत या विराजमान है, यह सम्पूर्ण रूप ब्रह्म में ही है, ब्रह्म ही वरिष्ठ अर्थात् सर्वश्रेष्ठ है।
''सर्वं खल्विदं ब्रह्म’’ यह सब दृश्यमान् जगत् ब्रह्म का ही मूर्त्तरूप है।
रागोपहतिर्ध्यानम्-(सांख्य 3.30) सांख्यदर्शन के तृतीय अध्याय में कहा है कि, राग से उपहत हो जाना अर्थात् रागमुक्त हो जाना ही ध्यान है। सूत्र में राग शब्द पढ़ने से द्वेष का भी ग्रहण हो जाता है, क्योंकि राग और द्वेष एक ही सिक्के के दो पहलु हैं। जब व्यक्ति को किसी के प्रति राग होता है तो उस राग में बाधा डालने वाले तत्त्वों से द्वेष भी अवश्य ही होता है। पर जब वैराग्य होने से कोई कामना ही चित्त में शेष नहीं बची तो राग कैसे उत्पन्न होगा क्योंकि जहाँ चाहत है वहाँ राग है और जब राग ही नहीं बचा तो द्वेष किसी से हो ही नहीं सकता। जब चित्त में राग, द्वेष दोनों ही समाप्त हो गए इसका मतलब है अविद्या समाप्त हो गई और तब तो मात्र ब्रह्म रूपी विषय ही चित्त में रह गया। तब संसार भी विषय बने तो राग-द्वेष से मुक्त अपने यथार्थ रूप में उपस्थित होगा, किसी विषय का विशुद्ध ज्ञान का प्रवाह बने यही तो ध्यान है।
ध्यान के मुख्य रूप से दो चरण हैं एक सम्पूर्ण अस्तित्व को भगवान् के ऐश्वर्य, महिमा या भगवान् की रचना के रूप में अनुभव करते हुए सबके मूल में ब्रह्म को अनुभव करना, सब स्वरूपों  में ब्रह्मस्वरूप, सब सम्बन्धों में ब्रह्मसम्बन्ध, सब सुखों में ब्रह्मसुख, सब ऐश्वर्यों में ब्रह्म का ही ऐश्वर्य, सब शक्तियों में ब्रह्म की शक्ति अर्थात् समस्त ज्ञान, ऐश्वर्य एवं सामर्थ्य के मूल में भगवान् को ही अनुभव करना यह भगवान् का सगुण साकार ध्यान या उपासना है तथा इन सब मूर्त्तरूपों के पीछे अमूर्त्त, निराकार आत्मा या परमात्मतत्त्व का साक्षात्कार जो ज्ञानमात्र, चिन्मात्र व आनन्दमय ब्रह्म है, उसमें समाहित होना यह निर्गुण  निराकार ध्यानोपासना है।
अब यह चर्चा तो हुई उन लोगों की जो योगीजन हैं, ब्रह्म का साक्षात्कार ही जिनका सर्वोपरि लक्ष्य है। पर प्रश्न यह उठता है कि जिनका लक्ष्य संसार है, उनके लिए भी 'ध्यानका कोई सदुपयोग है या नहीं? उत्तर है उनके लिए भी ध्यान बहुत उपयोगी है। हमारे यहाँ तो सामान्य बोल-चाल की भाषा में भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता है। यदि कोई खाना खा रहा हो या पढ़ रहा हो या कहीं जा रहा हो तो घर के बड़े बोलते हैं, भाई ध्यान से खाना, ध्यान से पढ़ना, ध्यान से जाना, इसका तात्पर्य यह है कि जिस समय जो कार्य कर रहे हो उस समय, उसी विषय के ज्ञान पर एकाग्र रहेंगे तो उसका प्रतिफल अधिक अच्छा, अधिक लाभकारी व अधिक प्रसन्नता प्रदान करने वाला होगा। अत: निष्कर्ष रूप में ध्यान मानव मात्र के लिए शारीरिक, मानसिक, प्राणिक, बौद्धिक, वाचिक, व्यवहारिक व आत्मिक हर पहलू की दृष्टि से हमें एक नयी ऊर्जा, शान्ति, सन्तोष व सुख देने की पद्धति है। आजकल यद्यपि ध्यान के नाम पर अशास्त्रीय या अवैदिक पद्धतियाँ भी प्रचलित हैं, किन्तु वास्तव में ध्यान उसी व्यक्ति का घटित होता है, जो योग के पहले 6 अङ्गों का यथोचित्त पालन कर चुका है, जिस प्रकार नींद की विधि तो बतायी जा सकती है, पर अच्छी नींद किसी को दिलायी नहीं जा सकती, वह तो परिणाम है जो व्यक्ति अपने कर्त्तव्य कर्मों का यथोचित्त पालन करता है उसे अच्छी नींद, उसके परिणाम स्वरूप मिलती है। उसी प्रकार ध्यान की विधि तो हमारे ऋषियों ने बता दी है, लेकिन उस की स्थिति में कोई बिना योगाङ्गों के अनुष्ठान के पहुंचा नहीं सकता, वह तो परिणाम है, अष्टाङ्ग योग के 6 अङ्गों का यथोचित्त पालन करने वाले व्यक्ति के जीवन में ही ध्यान घटित होता है, फिर वह चाहे कोई संसारी हो या ब्रह्मचारी, योगी संन्यासी हो। ध्यान तो सभी के लिए अनिवार्य है।

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